अखिल भारतीय प्राच्य ज्योतिष शोध संस्थान

राजस्थान के खैरवाल ग्राम (दौसा) के मूल निवासी पण्डित नन्दकिशोर शर्मा जी ने ईस्वी सन् 1950 से संस्थान के ज्योतिषीय कार्यों का श्रीगणेश किया था, जो कि आज भी अनवरत जारी है। संस्थान ने तभी से अंधेरे से उजाले की ओर अपना सफलता का सफर प्रारम्भ कर दिया था। संस्थान ने अपना पंजीयन राजस्थान सरकार से ईस्वी सन् 1992 में करवाया। पंजीयन के पश्चात् संस्थान का प्रथम ज्योतिष महासम्मेलन ईस्वी सन् 2001 में ब्रह्मराम मन्दिर, जयपुर में हुआ। ज्योतिष के द्वारा आमजन की समस्याओं के समाधान के लिए देश की अग्रणी संस्था रहते हुए ईस्वी सन् 1992 में संस्थान ने सवाई जयपुर पंचांग एवं ज्योतिष सम्राट् पंचांग का शुभारंभ किया जिसे कि ईस्वी सन् 1997 में भारत सरकार के रजिस्ट्रार न्यूज इन्फोर्मेशन विभाग द्वारा पंजीकृत करवाया गया। इसी क्रम में आगे बढ़ते हुए ईस्वी सन् 2009 में आमजन की अत्यधिक मांग पर संस्थान का अब तक का सबसे सफल प्रकाशन ज्योतिष सम्राट् कालदर्शक बाजार में आया जिसे लाखों पाठकों का प्यार मिला।
अखिल भारतीय प्राच्य ज्योतिष शोध संस्थान के जनसेवी कार्यों को देखते हुए ईस्वी सन् 2005 में उदयपुर के महाराणा श्रीजी श्री अरविन्द सिंह जी मेवाड़ ने अपने राजमहल से प्रकाशित श्रीमेवाड़ विजय पंचांग के पाण्डुलिपि सम्पादन का कार्यभार संस्थान को सौंपा, जिसे संस्थान के सचिव पण्डित चन्द्रशेखर शर्मा एवं डॉ. रवि शर्मा अत्यंत मनोयोगपूर्वक कर रहे हैं। वर्तमान समय में श्रीमेवाड़ विजय पंचांग मेवाड़ क्षेत्र का सबसे सफल पंचांग बन चुका है।
पंचांगों के प्रकाशन के बाद संस्थान ने पुस्तकों के द्वारा भी जनसेवा को जारी रखा है। अभी तक लगभग 28 से अधिक पुस्तकों/पंचांगों/कालदर्शकों का सफल निर्माण/सम्पादन/प्रकाशन संस्थान द्वारा देशविदेश के स्तर पर किया जा चुका है।